Android app for Vrats, Muhurat, Rashifal, Hindu Calendar and festivalsKundali, Kundali-Matching, Vrats, Muhurat, Rashifal, Hindu Calendar
These calendars are suitable for all those people who are living away from their hometown but still wants to keep a check on their religious events so they can observe or celebrate them.
You can get all important dates and puja timings of all Indian festivals calendar list.
It is Krishna Paksha Chaturthi Tithi or the fourth day during the waning or dark phase of moon on the entire day on August 7 and till 12:17 AM on August 8.
For more of these calendars, you need to keep checking this site. It is Amavasya Tithi or the no moon day till 8:03 AM on August 19. Get online daily Panchang for today. As you all must be aware that each religion has its own history and there are different religious events. Vedic panchang is also known as Panchanga & Panchangam. Tithi in Panchang – Hindu Calendar on Wednesday, 19 August 2020 – Amavasya Tithi or the no moon day in Hindu calendar and Panchang in most regions. कोरोना संक्रमण के चलते पहले लॉकडाउन फिर अनलॉक और फिर समय समय पर लग रहे लॉकडाउन के बीच पिछले करीब 4 माह से पड़ रहे त्यौहारों को लोग पहले की भांति नहीं मना पा रहे हैं।वहीं अब अगस्त 2020 में भी अनेक त्यौहार आ रहे हैं, ऐसे में यदि कोरोना के प्रकोप में काफी कमी आ जाती है या इसकी वैक्सीन आ जाती है तो माना जा रहा है कि इस बार लोग अगस्त के दौरान आने वाले त्योहारों को हर कोई धूमधाम से मना सकेंगे। ऐसे में आज हम आपको अगस्त 2020 में आने वाले प्रमुख तीज त्योहारों के बारे में बता रहे हैं।पंडित सुनील शर्मा के अनुसार अगस्त 2020 में रक्षा बंधन,जन्माष्टमी,हरतालिका तीज,गणेश चतुर्थी सहित कई त्यौहार आएंगे। इसमें जहां रक्षाबंधन में बहने अपने भाईयों की कलाइयों पर रक्षासूत्र बांधेंगी वहीं जन्माष्टमी में श्री कृष्ण का जन्म मनाया जाएगा।इस व्रत में भी सुहागन स्त्रियां अपने पति की लंबी उम्र और वैवाहिक सुख के लिए व्रत रखती हैं। वहीं कुंवारी कन्याएं भी इस व्रत कर कर सकती है। माना जाता है कि यदि कोई कुंवारी कन्या इस व्रत को करती है तो उसे मनचाहे वर की प्राप्ति होती है। कजरी तीज के व्रत में सुहागन स्त्रियां दुल्हन की सजती और संवरती है और विधिवत माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा करती हैं।हिन्दू कैलेण्डर में प्रत्येक चन्द्र मास में दो चतुर्थी होती हैं। पूर्णिमा के बाद आने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहते हैं और अमावस्या के बाद आने वाली शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहते हैं।भगवान गणेश के भक्त संकष्टी चतुर्थी के दिन सूर्योदय से चन्द्रोदय तक उपवास रखते हैं। संकट से मुक्ति मिलने को संकष्टी कहते हैं। भगवान गणेश जो ज्ञान के क्षेत्र में सर्वोच्च हैं, सभी तरह के विघ्न हरने के लिए पूजे जाते हैं। इसीलिए यह माना जाता है कि संकष्टी चतुर्थी का व्रत करने से सभी तरह के विघ्नों से मुक्ति मिल जाती है।संकष्टी चतुर्थी का उपवास कठोर होता है जिसमे केवल फलों, जड़ों (जमीन के अन्दर पौधों का भाग) और वनस्पति उत्पादों का ही सेवन किया जाता है। संकष्टी चतुर्थी व्रत के दौरान साबूदाना खिचड़ी, आलू और मूँगफली श्रद्धालुओं का मुख्य आहार होते हैं। श्रद्धालु लोग चन्द्रमा के दर्शन करने के बाद उपवास को तोड़ते हैं।अजा एकादशी भगवान विष्णु जी को अति प्रिय है इसलिए इस एकादशी का व्रत रखने से भगवान विष्णु और साथ में मां लक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इसे अन्नदा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।इस दिन रवि प्रदोष रहेगा,प्रदोष व्रत भगवान शिव को अति प्रिय है। माना जाता है इस दिन भगवान शंकर भक्तों को मनचाहा वरदान प्रदान करते हैं।- इस व्रत में व्रती का सफ़ेद कपड़े पहनना शुभ माना जाता है।- सांयकाल के समय शिवालय जाये या फिर घर पर ही पूजास्थान पर बैठे।- भगवान शंकर का ध्यान करते हुए, व्रत कथा और आरती पढ़नी चाहिए।- पूजा में शिवजी जी को फल, फूल, धतूरा, बिल्वपत्र और ऋतुफल अर्पित करें।- प्रदोष व्रत में अपने सामर्थ्य अनुसार किसी ब्राह्मण को भोजन करवाकर दान दक्षिणा देनी चाहिए।- फिर भी व्रति अपनी यथा शक्तिअनुसार संध्याकाल के पूजन के बाद सात्विक भोजन या फलाहार ले सकता है।भादो मास में जब सूर्यदेव अपनी राशि परिवर्तन करते हैं तो उस संक्रांति को सिंह संक्रांति कहते हैं। इस संक्रांति में घी के सेवन का विशेष महत्व है। दक्षिणी भारत में सिंह संक्रांति को सिंह संक्रमण भी कहा जाता है।इस दिन को सभी बड़े पर्व के रूप में मनाते है। सिंह संक्रांति के दिन भगवान् विष्णु, सूर्य देव और भगवान नरसिंह का पूजन किया जाता है। इस दिन भक्त पवित्र स्नान करते है।जिसके बाद देवताओं का नारियल पानी और दूध से अभिषेक किया जाता है। जिसके लिए केवल ताजे नारियल पानी का ही इस्तेमाल किया जाता है। बहुत से लोग इस दिन भगवान गणेश का भी पूजन करते है और प्रार्थना करते है। कुछ समुदायों में सूर्य राशि के कन्या राशि में प्रवेश करने तक विशेष पूजन किया जाता है। इस दिन सूर्य देव की पूजा का खास महत्व होता है।वैसे तो साल में एक बार मनाई जाने वाली महाशिवरात्रि बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है, लेकिन इसके अलावा भी वर्ष में कई शिवरात्रियां आती हैं, जिन्हें प्रत्येक महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाते हैं। यदि भाद्रपद अमावस्या सोमवार के दिन हो तो इस कुश का प्रयोग 12 सालों तक किया जा सकता है। कुश एकत्रित करने के कारण ही इसे कुशग्रहणी अमावस्या कहा जाता है। पौराणिक ग्रंथों में इसे कुशोत्पाटिनी अमावस्या भी कहा गया है। शास्त्रों में दस प्रकार की कुशों का उल्लेख मिलता है –मान्यता है कि घास के इन दस प्रकारों में जो भी घास सुलभ एकत्रित की जा सकती हो इस दिन कर लेनी चाहिये। लेकिन ध्यान रखना चाहिये कि घास को केवल हाथ से ही एकत्रित करना चाहिये और उसकी पत्तियां पूरी की पूरी होनी चाहिये आगे का भाग टूटा हुआ न हो। इस कर्म के लिये सूर्योदय का समय उचित रहता है।भाद्रपद अमावस्या : 19 अगस्त 2020 बुधवार, को भाद्रपद अमावस्या पड़ रही है। यह अमावस्या 18 अगस्त 2020 सुबह 10 बजकर 39 मिनट से आरंभ होकर अगले दिन 19 अगस्त सुबह 8 बजकर 11 मिनट पर समाप्त होगी।उसके बाद माता पार्वती ने पूजा की सभी सामग्री नदी में प्रवाहित कर दी और अपना उपवास तोड़ा। ऐसी मान्यता है कि माता ने जब यह व्रत किया था, तब भाद्रपद की तीज तिथि थी व हस्त नक्षत्र था। बाद में राजा हिमालय ने भगवान शिव व माता पार्वती का विवाह कराया।हरतालिका तीज पर महिलाएं सुंदर मंडप सजाकर बालू से शिव जी और पार्वती जी की प्रतिमा बनाकर उनका गठबंधन करती हैं। इस साल हरतालिका तीज 21 अगस्त को मनाई जाएगी।इस दिन ढोल नगाड़े बजाते हुए, नाचते गाते हुए गणेश प्रतिमा को विसर्जन के लिये ले जाया जाता है। विसर्जन के साथ ही गणेशोत्सव की समाप्ति होती है।इस दिन भगवान विष्णु के वामन स्वरूप की आराधना की जाती है। जो साधक अपने पूर्वजन्म से लेकर वर्तमान में जाने-अंजाने किये गये पापों का प्रायश्चित करना चाहते हैं और मोक्ष की कामना रखते हैं उनके लिये यह एकादशी मोक्ष देने वाली, समस्त पापों का नाश करने वाली मानी जाती है।पुराणों के अनुसार एक प्रदोष व्रत करने का फल दो गायों के दान जितना होता है। इस व्रत के महत्व को वेदों के महाज्ञानी सूतजी ने गंगा नदी के तट पर शौनकादि ऋषियों को बताया था।उन्होंने कहा था कि कलयुग में जब अधर्म का बोलबाला रहेगा, लोग धर्म के रास्ते को छोड़ अन्याय की राह पर जा रहे होंगे उस समय प्रदोष व्रत एक माध्यम बनेगा जिसके द्वारा वो शिव की अराधना कर अपने पापों का प्रायश्चित कर सकेगा और अपने सारे कष्टों को दूर कर सकेगा।सबसे पहले इस व्रत के महत्व के बारे में भगवान शिव ने माता सती को बताया था, उसके बाद सूत जी को इस व्रत के बारे में महर्षि वेदव्यास जी ने सुनाया, जिसके बाद सूत जी ने इस व्रत की महिमा के बारे में शौनकादि ऋषियों को बताया था।मान्यता है कि रवि प्रदोष के दिन जो भी शिव भक्त व्रत रखकर सूर्यास्त के समय प्रदोष काल में भगवान शिव की विशेष पूजा उपासना करता है, महादेव भोलेबाबा उनको प्रसन्न होकर मनोवांछित फल प्राप्ति का आशीर्वाद देते हैं।केरल में इस त्यौहार के लिए चार दिन का अवकाश रहता है जो थिरुवोणम के दिन से एक दिन पहले से प्रारंभ होकर उसके दो दिन बाद समाप्त होता है। ये चार दिन प्रथम ओणम, द्वितीय ओणम, तृतीय ओणम, और चतुर्थ ओणम के रुप में जाने जाते हैं। द्वितीय ओणम मुख्य रुप से थिरुवोणम का दिन है।
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